बचपन में हमें जिन चीज़ों का शौक होता है, उन्हें पाने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं। मुझे साइकिल चलाने का बड़ा शौक था। उस समय हमारे पास खुद की साइकिल नहीं थी, इसलिए दूसरों की साइकिल देखकर मन मचल उठता था। जैसे ही मौका मिलता, बस चलाने की जिद पकड़ लेता।
हमारे गांव में पास के गांव सौन्टी से एक मोची आया करता था। सीधा-सादा इंसान था, सारा सामान एक जर्जर सी साइकिल पर लादे गांव-गांव घूमता और लोगों के जूते-चप्पल ठीक करता। जब भी आता, हम बच्चे उसके साथ हंसी-मजाक कर लेते। वो मुस्कराता, पर कभी बुरा नहीं मानता।
एक दिन वो हमारी गली में बैठा था। उसने मुझे आवाज़ दी, “भाई, तबीयत ठीक नहीं लग रही। ज़रा डॉक्टर से दवाई ला देगा?”
मैं थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन तभी उसने कहा, “मेरी साइकिल ले जाना।”
बस, फिर क्या था! दिल खुश हो गया।
मैंने झट से हां कर दी।
पर जैसे ही साइकिल हाथ में आई, सारा जोश ठंडा पड़ गया।
न आगे मडगार्ड था, न पीछे। चेन कवर भी नहीं था। सच कहूं तो वो साइकिल नहीं, एक चलता-फिरता ढांचा लग रही थी।
एक पल को तो सोचा, "इससे अच्छा पैदल चला जाऊं!"
फिर सोचा — साइकिल तो मिल ही गई, जैसे भी हो, चलाऊंगा जरूर।
मैं साइकिल लेकर निकल पड़ा। मुझे यही समझ आया कि डॉक्टर सौन्टी का है, इसलिए सीधा वहीं पहुंच गया। वहां जाकर पशुओं के अस्पताल में डॉक्टर को बोला, “मोची के लिए दवाई दे दीजिए।”
डॉक्टर हैरान होकर बोला, “कौन मोची? और इंसानों की दवाई मुझसे क्यों मांग रहे हो?”
मैं बोला, “यहीं सौन्टी का है।”
डॉक्टर बोला, “मैं तो ठोल गांव से आता हूँ, मुझे नहीं पता। उसे कहना खुद आ जाए।”
मैं वहां से खाली हाथ लौट आया।
जब मोची को बताया, तो वो सिर पकड़कर बैठ गया।
“अरे! मैंने तो सोँटा वाले गुरमेल डॉक्टर के पास भेजा था। तू सौन्टी क्यों चला गया?”
अब समझ आया कि मेरी गलती से वो परेशान हो गया, लेकिन मुझे तो साइकिल चलाने का सुख मिल गया था — बस वही काफी था।
कुछ सालों बाद खबर आई कि वो मोची अब इस दुनिया में नहीं रहा।
आज भी जब वो दिन याद आता है, तो दिल में एक टीस सी उठती है।
उस मोची की सादगी, उसका भरोसा — और हमारी मासूम सी शरारतें… सब याद आ जाती हैं।
वो सिर्फ एक मोची नहीं था, हमारी बचपन की यादों का हिस्सा था।
कुछ लोग अपनी सादगी से हमें वो खुशी दे जाते हैं, जो हम पूरी उम्र भी नहीं भूल पाते।"

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