Saturday, August 2, 2025

एक साइकिल, एक मोची और बचपन की यादें"

बचपन की यादें अक्सर किसी पुरानी चीज़, किसी पुराने इंसान या किसी छोटी-सी घटना से अचानक ज़हन में ताज़ा हो जाती हैं। हमारे गांवों की गलियों में ऐसे कई किरदार होते हैं, जो दिखने में मामूली लगते हैं, पर उनका हमारे बचपन में एक खास स्थान होता है। यह कहानी भी एक ऐसे ही साधारण से मोची की है—जो अपनी टूटी-फूटी साइकिल पर गांव-गांव घूमता था, लेकिन हमें वो अनमोल खुशी दे गया जिसे आज भी हम मुस्कुराकर याद करते हैं। ये सिर्फ एक मोची की कहानी नहीं है, ये उन दिनों की बात है जब हमारी मासूमियत हमारी सबसे बड़ी दौलत थी।

बचपन की कुछ यादें वक्त की धूल में छिपी रहती हैं, पर जब कभी अचानक सामने आ जाती हैं, तो मन को भीतर तक भिगो देती हैं। एक टूटी-फूटी साइकिल, एक सीधा-सादा मोची, और मासूम बचपन की एक चाह — इस कहानी में वो सब कुछ है जो आज के भागते जीवन में कहीं खो गया है। ये सिर्फ एक मोची की कहानी नहीं, वो दौर है जब छोटी-छोटी बातें भी दिल में गहरी छाप छोड़ जाती थीं।

बचपन में हमें जिन चीज़ों का शौक होता है, उन्हें पाने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं। मुझे साइकिल चलाने का बड़ा शौक था। उस समय हमारे पास खुद की साइकिल नहीं थी, इसलिए दूसरों की साइकिल देखकर मन मचल उठता था। जैसे ही मौका मिलता, बस चलाने की जिद पकड़ लेता।

हमारे गांव में पास के गांव सौन्टी से एक मोची आया करता था। सीधा-सादा इंसान था, सारा सामान एक जर्जर सी साइकिल पर लादे गांव-गांव घूमता और लोगों के जूते-चप्पल ठीक करता। जब भी आता, हम बच्चे उसके साथ हंसी-मजाक कर लेते। वो मुस्कराता, पर कभी बुरा नहीं मानता।

एक दिन वो हमारी गली में बैठा था। उसने मुझे आवाज़ दी, “भाई, तबीयत ठीक नहीं लग रही। ज़रा डॉक्टर से दवाई ला देगा?”
मैं थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन तभी उसने कहा, “मेरी साइकिल ले जाना।”

बस, फिर क्या था! दिल खुश हो गया।
मैंने झट से हां कर दी।
पर जैसे ही साइकिल हाथ में आई, सारा जोश ठंडा पड़ गया।

न आगे मडगार्ड था, न पीछे। चेन कवर भी नहीं था। सच कहूं तो वो साइकिल नहीं, एक चलता-फिरता ढांचा लग रही थी।
एक पल को तो सोचा, "इससे अच्छा पैदल चला जाऊं!"
फिर सोचा — साइकिल तो मिल ही गई, जैसे भी हो, चलाऊंगा जरूर।

मैं साइकिल लेकर निकल पड़ा। मुझे यही समझ आया कि डॉक्टर सौन्टी का है, इसलिए सीधा वहीं पहुंच गया। वहां जाकर पशुओं के अस्पताल में डॉक्टर को बोला, “मोची के लिए दवाई दे दीजिए।”

डॉक्टर हैरान होकर बोला, “कौन मोची? और इंसानों की दवाई मुझसे क्यों मांग रहे हो?”
मैं बोला, “यहीं सौन्टी का है।”
डॉक्टर बोला, “मैं तो ठोल गांव से आता हूँ, मुझे नहीं पता। उसे कहना खुद आ जाए।”

मैं वहां से खाली हाथ लौट आया।
जब मोची को बताया, तो वो सिर पकड़कर बैठ गया।

“अरे! मैंने तो सोँटा वाले गुरमेल डॉक्टर के पास भेजा था। तू सौन्टी क्यों चला गया?”
अब समझ आया कि मेरी गलती से वो परेशान हो गया, लेकिन मुझे तो साइकिल चलाने का सुख मिल गया था — बस वही काफी था।

कुछ सालों बाद खबर आई कि वो मोची अब इस दुनिया में नहीं रहा।
आज भी जब वो दिन याद आता है, तो दिल में एक टीस सी उठती है।
उस मोची की सादगी, उसका भरोसा — और हमारी मासूम सी शरारतें… सब याद आ जाती हैं।

वो सिर्फ एक मोची नहीं था, हमारी बचपन की यादों का हिस्सा था।

कुछ लोग अपनी सादगी से हमें वो खुशी दे जाते हैं, जो हम पूरी उम्र भी नहीं भूल पाते।"

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